जंगल देश के अनमोल संसाधन हैं उनकी रक्षा करना जरुरी है -वीरेंद्र तिवारी, आईएफएस, अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक, मंत्रालय

नित्यानंद पांडेय/अंकिता मिश्रा
वीरेंद्र तिवारी 1990 बैच के आईएसएफ अधिकारी हैं। उनका जन्म गोरखपुर में और पालन-पोसन मुंबई में हुआ। उनकी प्राथमिक शिक्षा मुंबई के महानगरपालिका स्कूल में हुई। हिंदी माध्यम से मैट्रिक उत्तीर्ण होने के बाद उन्होंने 1987 में रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान से केमिकल इंजीनियर के रूप में स्नातक किया। वीरेंद्र तिवारी ने महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों जैसे अमरावती, चंद्रपुर, धुले, परभणी और गोंदिया वन विभाग में सेवा की है। वर्तमान में वह अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक, मंत्रालय के पद पर कार्यरत हैं। वह वन संरक्षण अधिनियम, भूमि संबंधी मामलों, वन्यजीवों से संबंधित कार्यों की देखरेख के साथ ही 50 करोड़ वृक्षारोपण के महत्वपूर्ण मिशन पर काम कर रहे हैं। उनका लोगों को संदेश है कि वन की हिफाजत जरुरी ही नहीं, अनिवार्य है, क्योंकि ये देश के अनमोल संसाधन के साथ ही पर्यावरण के संतुलन के लिए भी आवश्यक हैं।
इंडिया अनबाऊंड के समूह संपादक नित्यानंद पांडेय के साथ एक विशेष साक्षात्कार में वीरेंद्र तिवारी ने अपनी विभिन्न पोस्टिंग के दौरान अपने अनुभव, उपलब्धियों और चुनौतियों के साथ ही वर्तमान पोस्टिंग के अपने विज़न और मिशन के बारे में खुलकर बात की। पेश हैं मुख्य अंशः


सवाल : कृपया अपने बचपन के दिनों के बारे में बताएं। आपका जन्म और पालन-पोसन कहां हुआ?
जवाब : मैं गोरखपुर जिले के एक छोटे से गांव में पैदा हुआ और मेरा पालन-पोसन मुंबई में हुआ। मैंने विक्रोली स्थित महानगरपालिका स्कूल में 7वीं तक पढ़ाई की। उसके बाद घाटकोपर के एक हिंदी मीडियम हाई स्कूल में 8 से 10 तक पढ़ाई की। एसएससी करने के बाद मैंने साइंस स्टीम ज्वाइन किया और एसआईईएस कॉलेज से 11वीं और 12 वीं की। उसके बाद मैंने यूडीसीटी (यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी) से इंजीनियरिंग की। अब वह इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी के नाम से जाना जाता है। मैंने 1987 में केमिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री ली।
सवाल : आपको भारतीय वन सेवा में शामिल होने के लिए कहां से प्रेरणा मिली?
जवाब : मैंने कभी भी सरकारी सेवा या किसी सार्वजनिक क्षेत्र में जाने के बारे में नहीं सोचा था। मैं हमेशा निजी क्षेत्र में काम करना चाहता था। यूडीसीटी से स्नातक करने के बाद, मैं HERDILLIA केमिकल, नवी मुंबई में नौकरी करने लगा। वहां मैंने लगभग 8 महीने काम किया। इसी दौराना मैं अपने एक सहकर्मी से प्रेरित हुआ। वह सिविल इंजीनियर हैं। उन्होंने मुझे यूपीएससी की परीक्षा में बैठने की सलाह दी, जिसके बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और आईआईटी बीएचयू, बनारस में एम टेक में नामांकन करा लिया। उसी दौरान मैंने 1989 में यूपीएससी की परीक्षा दी और मैं आईएफएस के लिए चयनित हो गया। उसके बाद मैंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी और भारतीय सूचना सेवा में मेरा चयन हो गया, लेकिन मैंने आईएफएस में शामिल होने का निर्णय लिया।
सवाल : कृपया 1990 आईएफएस बैच की यादों के बारे में बताएं। क्या आप अभी भी अपने बैच-मेट से मिलते-जुलते हैं?
जवाब : हालांकि मैं 1990 बैच से संबंधित हूं, लेकिन मैं 1990-91 के प्रशिक्षण में था। हमें फाउंडेशन कोर्स के लिए मसूरी भेजा गया। उसके बाद प्रोफेशनल कोर्स के प्रशिक्षण के लिए हमें देहरादून भेजा गया। प्रशिक्षण के दौरान की शानदार यादें आज भी मेरे जेहन में ताजा है और हम वाट्सएप ग्रुप के माध्यम से एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं। इस वाट्सअप ग्रुप को हमने 3 साल पहले शुरू किया है। इसके साथ ही जब भी संभव होता है, हम एक-दूसरे से मिलते हैं।
सवाल : कृपया अपनी विभिन्न पोस्टिंग के बारे में बताएं?
जवाब : मैं लगभग 2 साल तक महाराष्ट्र के जलगांव स्थित यावल डिवीजन में प्रोबेशन पर था। उसके बाद मैं अक्टूबर 1995 से मार्च 1999 तक मंत्रालय में ऑफिसर के रूप में स्पेशल ड्यूटी पर था। मैंने मंत्रालय में अपने कार्यकाल के दौरान वन्य जीवन, लघु वनोपज और उसे विभिन्न उद्योगों में सप्लाई का काम संभाला। मार्च 1999 में मेरा तबादला सावंतवाड़ी में उप वन संरक्षक के रूप में किया गया। यह लगभग 15 महीनों का मेरा संक्षिप्त कार्यकाल था और जून 2000 में मुझे धुले में स्थानांतरित कर दिया गया। वहां मैं लगभग 2 वर्षों के तक काम किया। वहां से मुझे परभणी में स्थानांतरित कर दिया गया। परभणी में लगभग 19 महीने तक वन उप संरक्षक के रूप में कार्यरत था। वहां से मेरा तबादला डीसीएफ के पद पर गोंदिया मे किया गया। गोंदिया में मैं लगभग 3 साल था। वहां से मेरा स्थानांतरण सावंतवाड़ी में किया गया। वहां मुझे वन से संबंधित काफी कार्य करने का अवसर मिला। यह पश्‍चिमी घाट और परभणी में स्थित है। वहां ज्यादा जंगल नहीं है इसलिए जंगल पर अतिक्रमण और अनधिकृत कटाई की कोई समस्या नहीं थी। गोंदिया एक बड़ा डिवीजन है और वह लगभग 1800 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसलिए बांस की कटाई, लकड़ी की कटाई, वृक्षारोपण, तेंदूपत्ता संग्रहण और सभी प्रकार के कार्यों की देखरेख की जिम्मेदारी थी। 2006 नवंबर में मुझे अमरावती में वन संरक्षक के पद पर नियुक्त किया गया। वहां मैंने एक कार्य योजना तैयार की, जो वनों की देखरेख और विकास के लिए काफी उपयोग रही। मैंने पश्‍चिम मेलघाट डिवीजन और बुलढाणा डिवीजन के लिए योजना तैयार की। जुलाई 2010 में मुझे वन कार्यालय तेंदू के संरक्षक के रूप में स्थानांतरित किया गया। मैंने उस पद पर रहते हुए इससे संबंधित सरकार की नीतियों की देखरेख की। 2011 में मुझे पीसीसीएफ कार्यालय में मुख्य संरक्षक, बजट के रूप में पदोन्नत किया गया। मैं लगभग 9 महीने तक वहां रहा और फिर मुझे चंद्रपुर जिले में फील्ड डायरेक्टर – तडोबा के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद मैं अमरावती में मुख्य वन संरक्षक के रूप में काम किया। मैंने वहां साढ़े 4 महीने काम किया और फिर मुझसे मेरी पसंद पूछी गई, तो मैंने मंत्रालय को अपनी पसंद बताया। जुलाई 2014 में मैं मुख्य संरक्षक के पद पर फिर से मंत्रालय आ गया। उसके बाद अगस्त 2018 में मुझे अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद पर पदोन्नत किया गया।
सवाल : अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के रूप में आपके सामने क्या चुनौतियां हैं?
जवाब : मैं वन संरक्षण अधिनियम के तहत आने वाले सभी मामलों को संभाल रहा हूं। इसके अलावा, मैं वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण कार्यों, 50 करोड़ वृक्षारोपण का काम भी देख रहा हूं। एक वन अधिकारी के रूप में चुनौती यह है कि जनसंख्या में वृद्धि के कारण जंगल पर बहुत दबाव है। वन क्षेत्र समान रहता है, लेकिन जंगल की गुणवत्ता बिगड़ जाती है, वन विभिन्न विकासात्मक परियोजनाओं में भी बदल जाता है। बढ़ती आबादी, पेड़ की कटाई के कारण आग, अतिक्रमण की घटनाएं होती हैं, लेकिन वन विभाग जंगल के संरक्षण के लिए उपलब्ध संसाधनों के साथ इसे बचाने और बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है।
सवाल : जंगल आजीविका के लिए कितना महत्वपूर्ण है?
जवाब : फोरेस्ट सेक्टर कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा भूमि उपयोग का सेक्टर है। सुदूर जंगल के किनारे के गांवों में लगभग 300 मिलियन आदिवासी और अन्य स्थानीय लोग अपने अस्तित्व और आजीविका के लिए जंगल पर निर्भर हैं और लगभग 70% ग्रामीण आबादी अपनी घरेलू ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के जंगल पर निर्भर करती है। जो लोग जंगलों में रहते हैं, वे अक्सर शिकारी, संग्रहकर्ता या खेती करने वाले किसानों के रूप में रहते हैं। ये मुख्य रूप से अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर होते हैं। इस तरह के लोग अक्सर स्वदेशी या अल्पसंख्यक जाति के होते हैं। इस प्रकार, वे आमतौर पर राजनीतिक और आर्थिक मुख्यधारा से दूर हैं। जो लोग जंगलों के पास रहते हैं, आमतौर पर वे जंगल के बाहर कृषि कार्य करत हैं। वे नियमित रूप से वन उत्पादों (लकड़ी, ईंधन, खाद्य पदार्थ, औषधीय पौधों आदि) का उपयोग अपने स्वयं के निर्वाह के लिए और आंशिक रूप से आय सृजन के लिए करते हैं। कृषि में शामिल लोगों को वनों से मिलेनावाले फल आदि पोषक तत्व भी जंगल से ही मिलते हैं। इस तरह के पूरक जंगल में इकट्ठा पत्तियों से गीली घास के रूप में हो सकते हैं। जंगल में अक्सर पशुओं को चराने के लिए भी ले जाते हैं। जंगल में झड़नेवाले पते और लकड़ियां भी सड़कर खाद बन जाती है और ये खेती तथा जंगलों के लिए पोषक तत्व के रुप में काम करते हैं।
सवाल : सरकार ने 2019 में 33 करोड़ वृक्षारोपण का लक्ष्य रखा है? कृपया इस बारे में बताएं?
जवाब : वर्ष 2016 में हमने एक दिन में 2 करोड़ पौधे लगाने का सफल प्रयोग किया। इसके बाद हमने विभाग की क्षमता और लोगों की प्रतिक्रिया को देखते हुए 2 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले 2.83 करोड़ हासिल किए। अब सरकार ने 3 साल में 50 करोड़ पौधे लगाने का फैसला किया है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए 2017 में 4 करोड़, 2018 में 13 करोड़ और 2019 में 33 करोड़ वृक्षारोपण किया जाना है। हमने 2017 में 4 करोड़ के मुकाबले हम 5.43 करोड़ वृक्षारोपण किया और 2018 में 13 करोड़ के मुकाबले हमने 15.88 करोड़ वृक्षारोपण किया और अब इस वर्ष हम 33 करोड़ का लक्ष्य रख रहे हैं। हमारा प्रमुख फोकस जंगल से बाहर है। हमारे पास वन के अंतर्गत लगभग 20% क्षेत्र है, जिसमें से 16% क्षेत्र में वन आवरण है और महाराष्ट्र वन के बाहर पेड़ में अग्रणी है। महाराष्ट्र में वन क्षेत्र के बाहर वृक्षों की संख्या सर्वाधिक है। इसलिए राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार अगर हमें 33% लक्ष्य प्राप्त करना है हमें वन के बाहर पेड़ पर ध्यान केंद्रित करना होगा। वन मंत्रालय में मंत्रीजी के पदभार संभालने के बाद एक महत्वपूर्ण फैसला किया गया है। अब वन विभाग के साथ सामाजिक वानिकी का भी विलय कर दिया गया है। इससे पहले सामाजिक वानिकी जल संरक्षण विभाग के अधीन थी।
सवाल : विकास परियोजनाओं के कारण मैंग्रोव नष्ट हो रहे हैं, कृपया इस बारे में बताएं?
जवाब : महाराष्ट्र देश का पहला राज्य है, जिसमें अलग मैंग्रोव सेल है। 2005 में उच्च न्यायालय ने मैंग्रोव के संरक्षण के लिए आदेश दिया है जिसमें यह कहा गया है कि सरकारी भूमि पर सभी मैंग्रोव को संरक्षित वन घोषित किया जाना चाहिए और निजी भूमि पर मैंग्रोव को वन घोषित किया जाना चाहिए तथा मैंग्रोव से 50 मीटर की दूरी तक कोई भराव, निर्माण, डंपिंग नहीं होनी चाहिए। जनवरी 2012 में राज्य सरकार ने मैंग्रोव सेल बनाई और इसके अलावा एक और यूनिट मुंबई के लिए बनाई गई, जिसे मैंग्रोव संरक्षण इकाई के रूप में जाना जाता है। यह मुंबई, नवी मुंबई और ठाणे क्षेत्र की देखभाल करती है। एक और बड़ा विकास हुआ है, वह यह है कि नवी मुंबई में नए हवाई अड्डे के लिए भारत सरकार के निर्देशों के अनुसार हमें सिडको से लगभग 115 करोड़ मिले हैं। हमने सरकारी जमीन पर 15,000 हेक्टेयर मैंग्रोव की घोषणा की है। यह भूखंड भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 4 के तहत जंगल का है। हमने 115 करोड खर्च कर मैन्ग्रोव फाउंडेशन बनाया है। हमें एमएमआरडीए से भी कुछ फंड मिला है जो फिक्स डिपॉजिट में रखा गया है। उससे हमें प्रति वर्ष लगभग 15-20 करोड़ का ब्याज मिलता है। उस रकम से मैंग्रोव फाउंडेशन काम कर रहा है। मैंग्रोव फाउंडेशन ग्रहों के अस्तित्व और मानव जाति के लिए काम करता है तथा जहां भी जरुरत होती है, फाउंडेशन वहां पैसे से मदद करता है। फाउंडेशन का लक्ष्य मैंग्रोव को एक कॉर्पोरेट के रूप में स्थापित करना है।
सवाल : महाराष्ट्र राज्य में कितने बाघ अभ्यारण्य हैं?
जवाब : हमारे पास बाघों के 6 जंगल हैं। सबसे पुराना मेलघाट (अमरावती) है, जिसमें गुगामल राष्ट्रीय उद्यान, मेलघाट वाइल्ड लाइफ अभयारण्य और कई उपयोगी क्षेत्र, ताडोबा – अंधारी (चंद्रपुर) शामिल हैं। इनमें ताड़ोबा राष्ट्रीय उद्यान और अंधारी वाइल्ड लाइफ अभयारण्य और पेंच (नागपुर) भी शामिल हैं। पेंच राष्ट्रीय उद्यान है। इसके साथ ही बोर, नवागांव – नागजिरा और सह्याद्रि के जंगल भी हैं।
सवाल : महाराष्ट्र में वन विभाग की आगामी परियोजनाएं क्या हैं?
जवाब : 2019 में हमारे पास 33 करोड़ वृक्षारोपण का लक्ष्य है, जिसमें से लगभग 17.50 करोड़ वृक्षारोपण वन विभाग द्वारा किया जाना है और शेष सभी ग्राम पंचायतों सहित अन्य विभागों द्वारा किया जाना है। इसके लिए हम रक्षा, रेलवे और अन्य केंद्रीय सरकार के संगठन की भी मदद ले रहे हैं। इसके लिए नियमित बैठकें सचिव द्वारा आयोजित की जाती हैं और सभी आंकड़े ऑनलाइन वायरल किए जाते हैं। यह बड़ा लक्ष्य है, जिसे हमें 2019 में हासिल करना है।
सवाल : आपके जैसे वन अधिकारी बनने की ख्वाहिश रखने वाले युवाओं को आप क्या सुझाव देना चाहते हैं?
जवाब : मैं इस सेवा में उनका स्वागत करना चाहूंगा क्योंकि यह सबसे अच्छी सेवाओं में से एक है। यह पर्यावरण, वन और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए काम करने का बेहतरीन मौका देता है।
सवाल : पर्यावरण के बारे में आप नागरिकों और इंडिया अनबाऊंड के पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
जवाब : सरकार ने पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार तथा देश के जंगलों और वन्य जीवन की सुरक्षा के लिए ग्रीन आर्मी शुरू की है। इंडिया अनबाऊंड के माध्यम से मैं सभी नागरिकों से ग्रीन आर्मी में अपना नामांकन करने का अनुरोध करना चाहूंगा। हमने इसके लिए लगभग 1 करोड़ लोगों को इससे जोड़ने का लक्ष्य रखा है और अब तक लगभग 58 लाख लोग पंजीकृत हो चुके हैं। यह वेबसाइट पर उपलब्ध बहुत ही सरल प्रक्रिया है। कृपया अपना नामांकन करें और वन तथा वन्यजीवों के संरक्षण में योगदान दें क्योंकि यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह जंगलों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखे।

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